नई दिल्ली: दुनिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति केंद्र तक सीमित रखने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयानों में भी भारत की इसी रणनीतिक सोच की झलक दिखाई देती है। अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों के बावजूद नई दिल्ली रूस सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ अपने संबंधों को भी अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ा रही है।
जयशंकर के रुख का व्यापक संदेश यह है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पहले जैसी स्थिर नहीं रही। कई देशों के बीच आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में भारत किसी एक गुट के दबाव में आने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ मुद्दे के आधार पर सहयोग करने की नीति अपना रहा है।
अमेरिका के सामने बदलती वैश्विक चुनौती
अमेरिका लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में कई देश अपनी विदेश नीति में अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं। एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच नए समीकरण बनने से दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय होती दिखाई दे रही है।
भारत का मानना है कि किसी देश के साथ साझेदारी का आधार केवल राजनीतिक नजदीकी नहीं बल्कि आपसी हित भी होना चाहिए। इसी वजह से नई दिल्ली अमेरिका के साथ तकनीक, रक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी रखते हुए रूस तथा अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखने को महत्वपूर्ण मानती है।
जयशंकर की विदेश नीति की सोच में यह बात लगातार सामने आती रही है कि भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए। इसका अर्थ किसी देश से दूरी बनाना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग साझेदारों के साथ काम करने की क्षमता बनाए रखना है।
रूस के साथ संबंधों को लेकर भारत का अलग रुख
रूस भारत के पुराने रणनीतिक साझेदारों में शामिल है। रक्षा, ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दोनों देशों के लंबे समय से संबंध हैं। यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए मॉस्को के साथ संवाद और आर्थिक संबंध जारी रखे।
भारत का तर्क रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों जैसे विषयों पर फैसले देश की परिस्थितियों के अनुसार लिए जाने चाहिए। इसी कारण रूस के साथ भारत के संबंधों को केवल अमेरिका-रूस प्रतिस्पर्धा के चश्मे से देखना नई दिल्ली को स्वीकार्य नहीं है।
भारत की यह नीति बताती है कि वह अंतरराष्ट्रीय विवादों में किसी एक पक्ष का हिस्सा बनने के बजाय अपने हितों के लिए स्वतंत्र विकल्प खुले रखना चाहता है।
पाकिस्तान का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
दक्षिण एशिया की राजनीति में पाकिस्तान भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा पार आतंकवाद, सुरक्षा और कश्मीर जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से तनाव रहा है।
भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ आगे नहीं बढ़ सकते। पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार के संबंधों में सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा भारत के लिए प्रमुख रहेगा।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पाकिस्तान के संबंध कई शक्तियों के साथ बदलते रहे हैं। अमेरिका, चीन, रूस और मध्य एशिया के देशों के साथ उसके रिश्ते अलग-अलग रणनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए क्षेत्रीय घटनाक्रम पर लगातार नजर रखना जरूरी हो जाता है।
भारत किसी एक खेमे तक सीमित नहीं
भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर रूस, खाड़ी देशों, जापान और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ भी संबंध मजबूत कर रही है।
इस नीति का उद्देश्य किसी एक देश के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं, बल्कि भारत के लिए अधिक से अधिक रणनीतिक विकल्प तैयार रखना है। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, रक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्र पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
भारत के लिए यह भी जरूरी है कि किसी अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में उसके पास वैकल्पिक साझेदार और बाजार उपलब्ध रहें। यही कारण है कि भारत विभिन्न बहुपक्षीय संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सक्रिय भूमिका बनाए हुए है।
दुनिया में बढ़ रही बहुध्रुवीय व्यवस्था
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था धीरे-धीरे एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रही है जिसमें कई शक्तियां एक साथ प्रभाव डाल रही हैं। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा, रूस और पश्चिम के बीच तनाव तथा यूरोप और एशिया में बदलते आर्थिक समीकरण इसका हिस्सा हैं।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए संतुलित कूटनीति महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है।
जयशंकर के बयानों में इसी व्यापक सोच की झलक मिलती है। भारत का संदेश यह है कि उसके विदेशी संबंध किसी बाहरी शक्ति द्वारा तय नहीं किए जा सकते। प्रत्येक साझेदारी का मूल्यांकन भारत अपने आर्थिक, सुरक्षा और रणनीतिक हितों के आधार पर करेगा।
आगे क्या होगा?
अमेरिका और भारत के बीच संबंध आने वाले वर्षों में भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, निवेश, शिक्षा और रणनीतिक सहयोग के कई क्षेत्र हैं। लेकिन साथ ही भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों और अन्य देशों के साथ साझेदारियों को भी समाप्त करने के पक्ष में नहीं है।
यही संतुलन भारत की विदेश नीति को अलग पहचान देता है। नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौरान अपने हितों की रक्षा करे और किसी अनावश्यक ध्रुवीकरण से बचे।
जयशंकर के रुख से साफ संकेत मिलता है कि भारत आने वाले समय में अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र निर्णय, राष्ट्रीय हित और बहुपक्षीय सहयोग के आधार पर आगे बढ़ाना चाहता है। बदलती विश्व व्यवस्था में यही रणनीति भारत को अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने विकल्प खुले रखने में मदद कर सकती है।


